यूरी ओलेनेव

लेखक के बारे में

दार्शनिक, कवि और निबंधकार। सेंट पीटर्सबर्ग राजकीय विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र संकाय से स्नातक। रुचि के क्षेत्र: संस्कृति का इतिहास, धर्म और मिथकशास्त्र।

फ़ोटो: अलेक्सांद्र स्पिरिदोनोव जूनियर, 2026

रचनाकार का वक्तव्य

शब्द धागे जैसे, शब्द रस्सी जैसे,
घाव सीते हैं, चाबुक बन जलाते हैं।
राह रोकते किसी अँधेरे वन की तरह
कोहरे, भ्रम और धुँधलके में ले जाते हैं।

इनसे हम संसार का चेहरा बुनते हैं,
जो हर पल आत्मा में उतरता है।
जैसे बिल्ली ऊन के गोले से खेलती है,
हमारा मन उसमें उलझता जाता है।

जब राह में अपना लक्ष्य खो देते हैं,
और वन में देवदार ओझल हो जाता है,
जब अपना पुश्तैनी घर भूल जाते हैं,
और यह भी कि कभी वहाँ हम कौन थे।

पर तुम भी मेरी तरह शब्दों के स्वामी हो,
तुम उन्हें आश्रय और छत देते हो,
उनका अर्थ और उनका भार तय करते हो—
यह सारा अनोखा वन तुम्हारा है।

इसमें तुम न्यायाधीश और खेवैया हो,
माली भी और पहरेदार भी।
और मैं भी तुम्हारी तरह ही
डालियाँ और झाड़ियाँ तोड़ता हूँ।

ताकि टटोलकर खोज सकूँ
अपनी पगडंडी, और फिर शुरू करूँ—
वन में यों ही भटकना नहीं,
बल्कि उसमें देखना और जानना।

उसका अनदेखा विस्तार,
जड़ों का बल और पक्षियों का गान,
आकृतियों की जटिल लय,
पत्थरों की शांति, नदियों की कलकल।

उस कोहरे को छाँटने के लिए
तुममें और मुझमें एक स्रोत दिया गया है—
चीज़ों में भेद कर पाने का वरदान।
उसके बिना तुम अपने भी नहीं रहते।

उत्तर खोजते हुए थको मत,
हर बात सदा «हाँ या नहीं» नहीं होती।
सबका सबसे संबंध खोजो—
कहाँ से, क्या, कैसे और क्यों।

हर अस्तित्व के पीछे एक नाम है—
जो यहाँ दिखता है, जो बस सुना गया है,
और उस सूक्ष्मतम खेल के पीछे भी,
जिसे तुम्हारा मन देख पाता है।

हर चीज़ का अपना स्थान खोजना—
जड़, तने, फल और पत्ते का,
सभी कर्मों की धाराओं को जोड़ना—
यही तुम्हारी विद्या, शक्ति और नियति है।

शब्द बस त्वचा हैं, देह नहीं,
मुखौटा हैं, मस्तिष्क और हड्डी नहीं।
आत्मा में उनकी ध्वनि गूँजती है,
पर उसे कोई दूसरा ही देख पाएगा।

बाहर कही गई बातों के परदे के पीछे
तुम उनसे अपनी तपन और दाह छिपाते हो।
शब्दों से पीड़ा और भय छिपाते हो,
शब्दों से आघात और विनाश रचते हो।

वाणी जीवन के लिए वस्त्र जैसी है,
चिनगारी बिना वह किसी को खींच नहीं सकती।
और वाणी बिना जीवन स्वप्न जैसा है—
पकड़ में न आने वाला, देहहीन।

गीतों और कविताओं के शब्दों से
हम उनकी स्मृति सँजोते हैं जो अब मौन हैं।
अपने ग्रंथों और लेखों में
तारों और वनस्पतियों के रहस्य रखते हैं।

शब्द समृद्ध भी हैं और रिक्त भी,
तुम भी उन्हें उदारता और मितव्ययिता से बरतो।
तब अपने विचारों के मोतियों से
लोगों के हृदय चकित कर दोगे।

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